पश्चिमी राजस्थान में जिला सीमाओं का फेरबदल: प्रशासनिक फैसला या सियासी चाल?

6 Min Read

बाड़मेर–बालोतरा परिसीमन ने बढ़ाई सियासी तपिश, सड़क से सोशल मीडिया तक घमासान

पश्चिमी राजस्थान की राजनीति एक बार फिर जिला सीमाओं के सवाल पर उबाल पर है। बाड़मेर और नवगठित बालोतरा जिले की सीमाओं में किए गए ताजा फेरबदल ने न केवल राजनीतिक दलों को आमने-सामने ला खड़ा किया है, बल्कि आमजन के बीच भी असमंजस और नाराजगी की स्थिति पैदा कर दी है। 31 दिसंबर 2025 को भजनलाल शर्मा सरकार द्वारा जारी आदेश के बाद यह मुद्दा तेजी से प्रशासनिक दायरे से निकलकर सियासी संघर्ष का रूप ले चुका है।

क्या है पूरा प्रशासनिक फैसला

राज्य सरकार की अधिसूचना के अनुसार, बाड़मेर जिले की गुड़ामालानी और धोरीमन्ना तहसीलों को अब बालोतरा जिले में शामिल कर दिया गया है, जबकि बालोतरा जिले की बायतु तहसील को पुनः बाड़मेर जिले में जोड़ दिया गया है। सरकार इसे प्रशासनिक संतुलन और बेहतर संचालन की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष इसे पूरी तरह राजनीतिक निर्णय करार दे रहा है।

यह फैसला वर्ष 2023 में कांग्रेस सरकार के दौरान किए गए जिले के गठन और सीमांकन को पलटने जैसा माना जा रहा है। तब बालोतरा को नया जिला बनाते समय बायतु को उसमें शामिल किया गया था, जबकि गुड़ामालानी और धोरीमन्ना को बाड़मेर जिले में ही रखा गया था। अब दो साल बाद हुए इस उलटफेर ने पुराने घाव फिर से हरे कर दिए हैं।

धरने पर उतरे हेमाराम चौधरी, आंदोलन की चेतावनी

इस फैसले के विरोध में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और छह बार के पूर्व विधायक हेमाराम चौधरी धोरीमन्ना उपखंड मुख्यालय पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। कड़ाके की सर्दी के बावजूद वे धरना स्थल पर ही डटे हुए हैं। उनके साथ बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, जनप्रतिनिधि और कांग्रेस कार्यकर्ता मौजूद हैं।

हेमाराम चौधरी का कहना है कि यह निर्णय जमीनी हकीकत, भौगोलिक परिस्थितियों और आमजन की सुविधा के बिल्कुल खिलाफ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई गांवों के लोगों को अब तहसील, उपखंड और जिला स्तर के कार्यों के लिए अलग-अलग दिशाओं में लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी। इससे समय, पैसा और संसाधनों की बर्बादी होगी, जो पहले से ही सीमित सुविधाओं वाले रेगिस्तानी क्षेत्र के लिए बड़ा बोझ है।

उन्होंने सरकार से इस फैसले पर तत्काल पुनर्विचार की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि आदेश वापस नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।

कांग्रेस का आरोप: जनता नहीं, राजनीति केंद्र में

कांग्रेस ने इस पूरे मामले को जनविरोधी और राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित बताया है। पार्टी के नेता हरीश चौधरी, जो बायतु से विधायक भी हैं, ने कहा कि यह फैसला लोगों की सहूलियत नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन और चुनावी गणित को ध्यान में रखकर लिया गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे “तुगलकी फरमान” करार देते हुए कहा कि इस फैसले से आमजन को सीधे तौर पर नुकसान होगा और प्रशासनिक तर्क पूरी तरह खोखले हैं।

कांग्रेस नेताओं का दावा है कि गुड़ामालानी और धोरीमन्ना जैसे दूरस्थ इलाकों के लिए बालोतरा जिला मुख्यालय तक पहुंचना ज्यादा कठिन है, जिससे स्वास्थ्य, राजस्व और पुलिस जैसे जरूरी कामों में देरी और परेशानी बढ़ेगी।

भाजपा का पलटवार: प्रशासनिक संतुलन के लिए जरूरी

वहीं, भाजपा ने कांग्रेस के सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह प्रशासनिक समीक्षा और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर लिया गया है। भाजपा उपाध्यक्ष रमेश सिंह इंदा के अनुसार, नए परिसीमन से विकास योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा और प्रशासनिक कामकाज में सुगमता आएगी।

भाजपा का दावा है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने से बौखलाई हुई है और इसी वजह से वह जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रही है। पार्टी नेताओं के मुताबिक, कई क्षेत्रों में लोग इस बदलाव से संतुष्ट हैं, जिसका विरोध केवल कांग्रेस तक सीमित है।

जश्न बनाम विरोध: दो ध्रुवों में बंटा इलाका

जहां एक ओर कांग्रेस कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा समर्थकों ने कुछ क्षेत्रों में रैलियां निकालकर और पटाखे फोड़कर फैसले का स्वागत किया है। इससे साफ है कि यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक कागजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़क और जनभावनाओं की लड़ाई बन चुका है।

आने वाले चुनावों पर असर तय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिसीमन आगामी स्थानीय निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों पर गहरा असर डाल सकता है। गुड़ामालानी और बायतु दोनों ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र माने जाते हैं, जहां कांग्रेस और भाजपा के मजबूत आधार रहे हैं। ऐसे में जिला सीमाओं में यह बदलाव आने वाले समय में सियासी समीकरणों को नई दिशा दे सकता है।

बाड़मेर-बालोतरा जिला सीमा फेरबदल अब केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं रहा। यह फैसला जनसुविधा, क्षेत्रीय संतुलन और राजनीतिक रणनीति—तीनों के बीच खींचतान का प्रतीक बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपने फैसले पर कायम रहती है या जनविरोध और राजनीतिक दबाव के आगे कोई नया रास्ता निकालती है।

Share This Article
Exit mobile version