समदड़ी (बालोतरा)।
बालोतरा जिले के समदड़ी क्षेत्र से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां मानसिक बीमारी से जूझ रहे एक व्यक्ति को उसके ही घर में वर्षों से बेड़ियों में जकड़कर रखा गया है। यह कहानी है मुथो के वेरा, रानीदेशीपुरा बाइपास मार्ग क्षेत्र में रहने वाले महेंद्र माली की, जिसकी उम्र भले ही आज करीब 40 वर्ष के आसपास है, लेकिन उसका जीवन पिछले तीन दशक से अंधेरे, पीड़ा और असहायता में गुजर रहा है।
परिजनों के अनुसार, महेंद्र की मानसिक स्थिति चौथी कक्षा के दौरान ही बिगड़ने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी हरकतें असामान्य होती चली गईं। उस समय परिवार ने इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि बेटे के इलाज के लिए जोधपुर से लेकर राजधानी तक के चक्कर काटे। कई चिकित्सकों को दिखाया गया, दवाइयां बदली गईं, लेकिन कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ। वर्षों की कोशिशों के बाद भी जब हालात नहीं बदले तो परिवार की उम्मीदें टूटने लगीं।
बेड़ियां मजबूरी बन गईं
परिजनों का कहना है कि महेंद्र कभी-कभी अचानक हिंसक हो जाता था, खुद को और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की आशंका बनी रहती थी। ऐसे में मजबूरी में उसे बेड़ियों से बांधकर रखने का फैसला लिया गया। यह फैसला किसी क्रूरता का परिणाम नहीं, बल्कि एक लाचार परिवार की विवशता है, जो अपने बेटे को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा कदम उठाने को मजबूर हुआ।
आज स्थिति यह है कि बूढ़े माता-पिता खुद बीमारियों से जूझ रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे बेटे की देखभाल में दिन-रात लगे रहते हैं। महेंद्र की हालत देखकर वे हर पल चिंता में रहते हैं कि उनके बाद उसका क्या होगा।
मीडिया रिपोर्ट के बाद हरकत में आया प्रशासन
इस मामले की जानकारी जब मीडिया के माध्यम से सामने आई तो स्थानीय प्रशासन और तहसील स्तर की टीम हरकत में आई। तहसील प्रशासन और मेडिकल टीम एम्बुलेंस के साथ मौके पर पहुंची और महेंद्र को सरकारी उपचार के लिए ले जाने की कोशिश की। हालांकि, परिजनों ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने से साफ इनकार कर दिया।
परिजनों का कहना है कि सरकारी उपचार से उन्हें पहले कोई खास लाभ नहीं मिला। वर्तमान में महेंद्र का इलाज जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल से लंबे समय से चल रहा है और वे उसी पर भरोसा जताते हैं। उनका मानना है कि अब यदि कोई निजी संस्था, सामाजिक संगठन या विशेषज्ञ आगे आए, तो शायद महेंद्र को बेहतर इलाज मिल सके और उसे बेड़ियों से मुक्ति मिल पाए।
निजी संस्थानों से उम्मीद
परिवार ने समाज और स्वयंसेवी संस्थाओं से अपील की है कि यदि कोई मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी निजी संस्था, एनजीओ या विशेषज्ञ आगे आए, तो उनके बेटे का समुचित उपचार संभव हो सके। उनका कहना है कि अब वे शारीरिक रूप से भी कमजोर हो चुके हैं और लंबे समय तक इस स्थिति को संभाल पाना उनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है।
यह मामला न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने भी कई सवाल खड़े करता है। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता, सुविधाओं की पहुंच और जरूरतमंद परिवारों को समय पर सहायता—ये सभी पहलू इस घटना में उजागर होते हैं।
महेंद्र माली की यह कहानी आज भी किसी मदद की राह देख रही है, ताकि एक इंसान को बेड़ियों से आज़ादी मिल सके और उसके माता-पिता शेष जीवन कुछ सुकून के साथ जी सकें।
