औद्योगिक इकाइयों का रासायनिक पानी बन रहा ऐतिहासिक मेले की सबसे बड़ी चुनौती
बालोतरा | तिलवाड़ा प्रदूषित पानी की रोकथाम को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई बालोतरा, बिठूजा और जसोल तक सीमित रहने से तिलवाड़ा क्षेत्र के सुप्रसिद्ध रावल मल्लीनाथ पशु मेले पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हर वर्ष मार्च–अप्रैल में आयोजित होने वाले इस ऐतिहासिक मेले से पहले मेला मैदान में भारी मात्रा में प्रदूषित पानी जमा हो रहा है, जिससे तैयारियां प्रभावित हो रही हैं।
पुरानी परंपरा का प्रतीक मल्लीनाथ पशु मेला
लूणी नदी के तट पर लगने वाला यह मेला करीब 700 वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा का प्रतीक है, जहां देशभर से पशुपालक अपने पशुओं के साथ पहुंचते हैं। लेकिन वर्तमान में बालोतरा औद्योगिक क्षेत्र की इकाइयों से निकलने वाला रासायनिक व दूषित निस्तारित पानी मेला मैदान में आकर भर रहा है। न तो इसका स्थायी निस्तारण हो पा रहा है और न ही इसके प्रवाह पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सका है।
हर वर्ष मेले के दौरान इस पानी को हटाने और अस्थायी व्यवस्थाओं पर लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, बावजूद इसके समस्या जस की तस बनी रहती है।

लोगों का आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब भी प्रदूषण को लेकर शिकायत की जाती है, तो प्रशासन का फोकस केवल बालोतरा, जसोल और बिठूजा तक ही सीमित रह जाता है, जबकि तिलवाड़ा और आगे के गांव लगातार इस गंभीर संकट से जूझ रहे हैं।
जहरीली हवाओं से बीमारिया , कृषि भूमि पर प्रभाव
दूषित पानी से उठने वाली दुर्गंध और जहरीली हवाओं के कारण लोगों में बीमारियां बढ़ रही हैं, वहीं आसपास की कृषि भूमि और पशुधन भी प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस और दीर्घकालिक समाधान नहीं किया गया है।
स्थानीय नागरिकों और पशुपालकों ने मांग की है कि तिलवाड़ा तक प्रदूषित पानी की रोकथाम के लिए प्रभावी और स्थायी कदम उठाए जाएं, ताकि ऐतिहासिक मल्लीनाथ पशु मेले की गरिमा बनी रहे और आमजन को इस गंभीर समस्या से राहत मिल सके।

