बालोतरा। कहते हैं कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसके कर्म अमर हो जाते हैं। राजस्थान के बालोतरा जिले के गिड़ा गांव की नाइयों की ढाणी से इंसानियत को झकझोर देने वाली एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने हर संवेदनशील दिल को भावुक कर दिया। महज 5 साल का मासूम भोमाराम, जो खुद जिंदगी की जंग हार गया, उसने जाते-जाते तीन लोगों को नई जिंदगी दे दी। यह संभव हो पाया उसके माता-पिता और परिवार के उस साहसिक फैसले से, जिसने दुख के पहाड़ के बीच मानवता का सबसे उज्ज्वल उदाहरण पेश किया।
बीमारी से संघर्ष और एम्स तक का सफर
भोमाराम पिछले कुछ समय से मिर्गी (दौरे पड़ने) की गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। 15 दिसंबर को उसकी तबीयत अचानक बिगड़ने पर परिजन उसे इलाज के लिए एम्स जोधपुर लेकर पहुंचे। पीडियाट्रिक इमरजेंसी विभाग में डॉक्टरों की टीम ने तुरंत इलाज शुरू किया। इलाज के दौरान बच्चे के सीटी स्कैन और अन्य जांचें की गईं, जिनमें सेरेब्रल एडिमा (दिमाग में सूजन) की पुष्टि हुई। इसके बाद जांच में स्टेटस एपिलेप्टिकस और सेंट्रल डायबिटीज इन्सिपिडस जैसी जटिल स्थितियां सामने आईं।
जब टूटी उम्मीद, तब आया सबसे कठिन पल
लगातार पड़ रहे दौरों के कारण भोमाराम की हालत लगातार बिगड़ती चली गई। आखिरकार 20 दिसंबर की रात, डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
यह खबर परिवार के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी। एक तरफ बेटे के ठीक होने की उम्मीद थी, दूसरी तरफ जिंदगी की सबसे कड़वी सच्चाई सामने खड़ी थी। परिवार गहरे सदमे में था।
दुख के बीच मानवता का फैसला
इसी दौरान एम्स के डॉक्टरों की टीम ने परिजनों को अंगदान (ऑर्गन डोनेशन) के बारे में जानकारी दी और समझाया कि भोमाराम के अंग किसी और की जिंदगी बचा सकते हैं। गहरे दुख और भावनात्मक संघर्ष के बीच परिवार ने आपस में विचार-विमर्श किया। अंततः रविवार को परिजनों ने अंगदान की सहमति दी। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन इंसानियत के लिए बेहद बड़ा था।
तीन जिंदगियों में लौटी रौशनी
22 दिसंबर की सुबह मेडिकल गाइडलाइन के अनुसार अंगदान की प्रक्रिया पूरी की गई।
भोमाराम का लिवर विशेष फ्लाइट से दिल्ली के ILBS (इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज) भेजा गया।
उसकी दोनों किडनी एम्स जोधपुर में भर्ती दो जरूरतमंद मरीजों को ट्रांसप्लांट की गईं।
इस तरह एक मासूम बच्चे की सांसें भले ही थम गईं, लेकिन तीन लोगों की जिंदगी में नई धड़कन शुरू हो गई।
पिता बोले – मेरा बेटा अब भी जिंदा है
भोमाराम के पिता भैराराम ने भावुक होते हुए कहा,
“हमें डॉक्टरों ने ब्रेन डेड होने की सूचना दी और अंगदान की सलाह दी। पूरे परिवार ने सोचा। हमारा बेटा भले ही इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसके अंग दूसरों में लगने से तीन लोगों की जिंदगी रोशन हो गई। हमारे लिए यही सबसे बड़ा सुकून है।”
समाज के लिए प्रेरणा बनी यह घटना
एम्स प्रशासन ने भी इस निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि अंगदान के प्रति जागरूकता से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। भोमाराम का यह बलिदान समाज के लिए एक प्रेरणा है कि दुख की घड़ी में भी मानवता का रास्ता चुना जा सकता है।

