आज जब चारों ओर नकारात्मक खबरें, अविश्वास और निराशा का माहौल दिखाई देता है, ऐसे समय में जैसलमेर से एक ऐसी खबर सामने आई है जो न केवल चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धि है, बल्कि मानवता, सेवा और समर्पण की मिसाल भी है। स्वर्ण नगरी जैसलमेर स्थित श्री जवाहिर हॉस्पिटल में हाल ही में एक 60 वर्षीय महिला के पेट में पनपी लगभग 6 किलोग्राम वजनी विशाल गांठ का सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर उसे नया जीवन दिया गया है।
तीसरे पड़ाव की शुरुआत और दर्द की दस्तक
महिला, जिसने जीवन के दो बड़े पड़ाव (0-30 वर्ष और 31-60 वर्ष) पार कर लिए थे और अब जीवन की तीसरी अवस्था में प्रवेश ही किया था, पिछले तीन महीनों से पेट में सूजन और लगातार बढ़ते दर्द से जूझ रही थी। शुरू में उन्होंने इसे सामान्य समस्या समझकर अनदेखा किया। परिवार को परेशान न करने की भावना ने उन्हें चुप रहने पर मजबूर कर दिया।
लेकिन समय के साथ पेट की सूजन इतनी बढ़ गई कि रोजमर्रा के काम करना भी मुश्किल हो गया। चलना-फिरना, बैठना-उठना तक कष्टदायक हो गया। अंदर ही अंदर वह आशंकित रहने लगीं कि कहीं यह बीमारी उनकी जिंदगी पर भारी न पड़ जाए। अंततः भारी मन से उन्होंने अपने बच्चों को स्थिति बताई और डॉक्टर को दिखाने की इच्छा जताई, ताकि जो भी समय शेष है, वह कम से कम पीड़ा से मुक्त हो।
150 किलोमीटर की दूरी, लेकिन हौसले अटूट
महिला के बच्चे भारत-पाकिस्तान सीमा के पास स्थित अपने गांव से बिना देर किए उन्हें लगभग 150 किलोमीटर दूर जैसलमेर लेकर आए। यह दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं थी, बल्कि उम्मीद और जीवन के बीच की दूरी थी, जिसे परिवार के प्रेम ने पाट दिया।
श्री जवाहिर हॉस्पिटल में जब महिला को डॉ. सत्ता राम पंवार (असिस्टेंट प्रोफेसर, जनरल सर्जरी) को दिखाया गया तो प्रारंभिक जांच में ही मामला गंभीर प्रतीत हुआ। विस्तृत परीक्षण और जांच के बाद स्पष्ट हुआ कि महिला के पेट में अत्यंत बड़ी गांठ विकसित हो चुकी है, जो लगभग पूरे पेट में फैल चुकी थी। स्थिति इतनी जटिल थी कि पेट के भीतर सामान्य अंगों के लिए बहुत कम जगह बची थी।
डॉक्टर स्वयं यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि इतनी विशाल गांठ के बावजूद महिला अब तक जीवित कैसे हैं और चल-फिर कैसे पा रही हैं।
संवेदनशील निर्णय: जैसलमेर में ही ऑपरेशन
मामले की गंभीरता को देखते हुए यह स्पष्ट था कि ऑपरेशन जोखिम भरा होगा। गांठ के फटने की स्थिति में शरीर में विषाक्त पदार्थ फैल सकते थे, जिससे मरीज की जान को सीधा खतरा हो सकता था। ऐसे में कई लोग बड़े शहर रेफर करने की सलाह दे सकते थे, लेकिन डॉक्टर सत्ता राम पंवार ने मरीज की स्थिति, परिवार की भावनाओं और समय की नाजुकता को समझते हुए जैसलमेर में ही ऑपरेशन करने का निर्णय लिया।
यह निर्णय सिर्फ एक चिकित्सकीय फैसला नहीं था, बल्कि आत्मविश्वास, टीमवर्क और सेवा भाव का प्रतीक था।
जटिल सर्जरी: 6 किलो की गांठ निकाली गई
लगभग सात दिन पूर्व सभी आवश्यक जांचों के बाद ऑपरेशन किया गया। यह सर्जरी तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल थी। मेडिकल भाषा में इसे
“Exploratory Laparotomy with Left Ovarian Mass Excision with TAH with BSO with Omentectomy”
कहा जाता है।
इस प्रक्रिया के दौरान महिला के पेट से लगभग 6 किलोग्राम वजनी गांठ को सफलतापूर्वक निकाला गया। ऑपरेशन के दौरान पूरी टीम ने अत्यंत सावधानी और समन्वय के साथ काम किया। हर कदम नाप-तोल कर रखा गया ताकि गांठ सुरक्षित रूप से बाहर निकाली जा सके और कोई जटिलता उत्पन्न न हो।
एनेस्थीसिया और ICU टीम की अहम भूमिका
सर्जरी की सफलता में एनेस्थीसिया एवं ICU स्पेशलिस्ट डॉ. नरेश शर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। ऑपरेशन के दौरान मरीज की जीवन रक्षक प्रणालियों की निगरानी और सर्जरी के बाद ICU में गहन देखभाल ने मरीज की रिकवरी को सुरक्षित और तेज बनाया।
ऑपरेशन के बाद मरीज को लगातार निगरानी में रखा गया। टीम ने संक्रमण, ब्लीडिंग या अन्य संभावित जटिलताओं पर विशेष ध्यान दिया। धीरे-धीरे मरीज की स्थिति स्थिर होती गई और कुछ ही दिनों में उन्होंने सामान्य रूप से खाना-पीना और चलना शुरू कर दिया।
प्रशासनिक मार्गदर्शन और टीमवर्क
इस पूरे ऑपरेशन में पीएमओ डॉ. रवींद्र सांखला का मार्गदर्शन और सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा। उनके प्रशासनिक समर्थन और चिकित्सा प्रबंधन ने टीम को सुचारू रूप से कार्य करने में सहायता दी।
ऑपरेशन टीम में शामिल रहे डॉ. सत्ता राम पंवार (असिस्टेंट प्रोफेसर, जनरल सर्जरी, डॉ. नरेश शर्मा (एनेस्थेटिक एवं ICU स्पेशलिस्ट, दिनेश सोनी एवं हेमराज वर्मा (मुख्य ऑपरेशन असिस्टेंट
दीपाराम जी एवं समस्त सर्जिकल वार्ड स्टाफ, यह सफलता किसी एक डॉक्टर की नहीं बल्कि पूरी टीम की समर्पित मेहनत का परिणाम है।
माँ के प्रति सेवा भाव ने छुआ दिल
इस पूरी घटना का सबसे भावुक पक्ष था बच्चों का अपनी माँ के प्रति समर्पण। आज के समय में जब वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा की खबरें अक्सर सामने आती हैं, वहीं इस परिवार ने 150 किलोमीटर की दूरी तय कर अपनी माँ को समय पर उपचार दिलाया। माँ की आंखों में जीने की जो चाह थी, वह डॉक्टरों और स्टाफ के लिए भी प्रेरणा बन गई।
अब स्वस्थ होकर घर लौटीं
सफल ऑपरेशन और सात दिनों की निगरानी के बाद महिला को पूर्णतः स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अब वह अपने घर लौट चुकी हैं और सामान्य जीवन की ओर अग्रसर हैं।
जैसलमेर जैसे सीमावर्ती जिले में इस स्तर की जटिल सर्जरी का सफल होना यह दर्शाता है कि अब चिकित्सा सुविधाएं बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रहीं। स्थानीय स्तर पर भी विशेषज्ञता, तकनीक और समर्पण के बल पर बड़े से बड़े ऑपरेशन संभव हैं।

